Friday, January 20, 2012

पन्ना

मैं लिखती थी.. जब तुम पढ़ते थे ..


ये सोचकर कि जो कह नहीं पाती.. वो बातें पन्नो पर पड़ी मिल जाए तुमको..
वो शब्द जो बन नहीं पाते.. जब बोलती हूँ बहुत.. पर कह नहीं पाती..
वो सब सुन लोगे मेरी चुप्पी कि आवाज़ में तुम..

अब न बातें हैं.. ना शब्द .. ना कोई किस्से.. 
अब लिखना भी क्या लिखना.. न रही मैं.. न हम ...

गुत्थी



हर शक्स इक सवाल है..


कि कैसे जिंदा है ज़िन्दगी जीकर..
शायद आहें मज़ाक लगती हैं..

तानेबानों में गुम गए हैं खुद..
सूनी सड़कें सुकून देती हैं..

रातें शरीक कर बीते दिनों की बातें 
दिन ढले महफ़िल जवान करती हैं ..

अँधेरे कि बत्तियां सी बना 
धीरे धीरे से आज..  मेरी रूह जलती है..


Sunday, December 5, 2010

दरवाज़ा



मैं जानती हूँ कि तुम जानते हो सब ..
जानते हो कि मैं जा रही हूँ..
कि खड़ी थी देर तक दरवाज़े पर.. दरवाज़ा खोला नहीं तुमने..
ताला बंद है.. चाबी छुपी थी तुम्हारे ही सिरहाने 
मैंने दस्तक नहीं दी कभी..
मैं सोचती थी कुछ फुट दूर सही तुम्हारी खटपट तो सुनाई देगी मुझे..
तुम शायद खुश थे कि मैं चाहकर कर भी छू नहीं पाती थी तुम्हारी दुनिया ..
थक गयी हूँ .. अकेले खड़े हुए..
कि अब सोचती हूँ कि कोई द्वार पर रोके तो चावल का कलश छुआने को..
खाली पैर की जगह पैर में पाज़ेब हो..
अब जाऊं अन्दर तो चोरो कि तरह नहीं .. अपनी मेहँदी के निशान छोड़कर..



Thursday, November 18, 2010

शायद..


बचपन से किस्से बहुत सुने..
घर पर थोड़े.. कुछ औरों से..
 
नफरत.. फितरत.. कुदरत.. हज़रत...
हर रोज़ सुने.. सोते जगते..
 
लगता था ये तो गप शप हैं..
गप्पें.. बातें..  ऊबी रातें..
 
अब लगता है हम सब किस्से..
कुछ पूरे हैं.. कुछ के हिस्से..
 
हर दिन किस्सा बढ़ जाता है..
कुछ पन्ने नए बढ़ाता है..
 
पर किस्से कुछ दिन चलते हैं..
भूलेंगे सब.. शायद हम सब..
क्यूंकि हम हैं.. हम सब शायद ..
हैं बस हम सब..
शायद.. अफ़वाह..
 
 
 

स्मृति-वन

आँखों के आगे ऐसे हैं... आँखों में बैठा आंसूं हो..
थोड़ी खट्टी.. थोड़ी मीठी.. बचपन का इमली चूरन हो..

हम भूले भी तो क्या भूले..
हम.. हम हैं.. क्यूंकि तुम, तुम हो..
कभी बंद हुई.. फिर खुल जाए.. टूटे डिब्बे का ढक्कन हो..

गाना अब तक जो सुनती हूँ.. अपने ही ऊपर लगता है..
कभी रोती हूँ... कभी हँस देती..
टूटी चूड़ी की खन खन हो..

हर याद तुम्हारी .. याद नहीं.

Wednesday, September 29, 2010

बचपन का लिफ़ाफ़ा

बंद  लिफ़ाफे  में  पोस्ट  की  हैं  अभी .. 
थोड़ी  सी  याद .. थोड़ी  सी  हँसी ...
थोड़े  से  बचपन  के  किस्से .. थोड़ी  सी  अलसाई  जाड़े  की  शाम ...
थोड़ा  सा  गुलाबी  आसमान .. एक  छोटा  गुदगुदा  बादल ..
आटे  की  चक्की  तक  की  सैर ... गोलगप्पों  का  तीखा  पानी ...
कुछ  जंगली  फूल .. स्कूल  की  चौक  ..
वैकेशन  का  होमेवोर्क .. नयी  किताबों  की  खुशबू ..
पर  खाली  सा  था  लिफ़ाफ़ा  अब  भी   ...
जगह  बाकी  थी  काफी ..
पर  अगला  लिफ़ाफ़ा  रूठ  जाता 

Saturday, September 25, 2010

किस्से




अम्मा  बाबा .. नाना  नानी ... 
चले  गए  अपने  किस्सों  के  साथ ...

खुशबू  याद  है  पर  उनकी ..

दादी  नानी  की  में  आंवले  के  तेल  की  मिलावट  है ..
बाबा  की शाम  के  चाय  के  साथ  वाले  बिस्किट सी ..
नानाजी  में  उरद  की  खिचड़ी  के  तड़के  की  तेज़ी ...

सवेरे  की  आरती  सी  आवाज़ ... 
कभी  कभी  बुद्ध  के  कीर्तन  से  जोश  में  बजती  है  कानो  में  ...

शाम  की  सैर  में  कदम  हलके  हलके  से ..  फिर  उतने  भी  नहीं ...
रात  में  दूध  के  गर्म  गिलास  या  कॉफ़ी  सी  गुनगुनी  बातें ..
कुछ  शिकायतें  भी ..

अब  ये  हमारे  किस्से  हैं ..